गुरुवार, 21 जनवरी 2010

मैनें जमीं पर चांद देखा

इस यौवन में है स्मरण
अपना बचपन,
वो किस्सा का उद्धरण-
श्वेत दुधिया आभा प्रकीर्ण,
मनोहर सुन्दरता,
अद्वितीय उज्ज्वल प्रभा
पारलौकिक तेज-ओज,
दिव्य-सौन्दर्य समाहित
रजनी के तिमिर तल पर
चांद रहता है ।
पारिजात के पुष्प खिलते,
फिर सहज छा जाता -
चिर-बसंत-बहार,
खूश्बू की खुमार,
मोतियों की-सी कांति, जब-जब
चांद हंसता है ।
परितः बिछ जाता
एक अलौकिक वृत्त
जगसमादरित
स्वतः स्वीकार्य आकर्षण
बिछती है चांदनी
नृत्य करता मुग्ध मन से मोर
और प्रणय-अनल में तपता चकोर
जब-जब
चांद खिलता है ।
विशाल नभथाल में
तारे मंडराते इर्द-गिर्द
और साथ लेकर
'प्रसन्न चेहरा', 'मुस्कान', 'हर्ष',
'गुदगुदी',
'अचम्भा', 'हिचकियां',
'अनिमेष नेत्र'
सप्तर्षि मिलते राह में
दुनियां की नजरें घूमती
उसके कदम के साथ ही जब
चांद चलता है।
"पूनम हा !"-
वाक् मेरा उनके लिए
फिर अचानक-
वह रौशनी कुछ मंद पड़ती,
शर्म का आंचल दिखा,
धीरे-धीरे मुखरा छिपा;
मन में उसे देखने को
पल भर मैं आंखें बंद किया
फिर खोला, तो ऐसा लगा-
अपनी तारीफ सुनकर,
बादलों की ओट में वो
चांद छुपता है ।
मेरी अभिलाषा है-
मन की शांति, शुकून और चैन के लिए
हमेशा देखता रहूं
चांद का यह सुस्मित चेहरा;
पर न जाने क्यों
सबसे शरमाकर
या मुझसे रूठकर ही
यह लंबी अमावस को चला जाता है
और तब
स्वाति की आस लगाए चातक की तरह,
घन-बूंद को तरसते मोर की तरह,
जल-हीन मीन की तरह
यह मेरा उद्विग्न मन
तड़पता रहता है जब
चांद सोता है ।
अभिलाषा है उससे दोस्ती की,
पर उसे कुछ नहीं बोलता
कि वो कहीं रूठ न जाए...
बचपन में कहानी सुनकर आस जगी थी,
और इंतजार में गुजारा
जवानी तक यह लंबा सफर,
अब इसे नहीं खोना चाहता;
कुछ और मुझे हासिल हो, न हो,
पर यह क्या कम है कि
जिसे लोग आसमां में देखते हैं
इतने करीब से, अपनी नजरों से
मैंने जमीं पर चांद देखा ।

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