पाकर तेरे मूक नयनों का निमंत्रण।
चाहता सर्वस्व कर दूं आज अर्पण।।
चन्द्र-मुख-जाज्वल्य पर कुछ तेज यों,
मैं स्वतः ही हो रहा निस्तेज क्यों;
प्रष्टा बनी चुपचाप मुझसे पूछती है,
असहज होकर वो कुछ पल सोंचती है--
होगी विजय किसकी ? कहीं हारूं न मैं रण।
चाहता सर्वस्व कर दूं आज अर्पण ।।
इस शर्म को न तू समझ कोई पण मेरा,
है अपेक्षित एक परिरम्भण तेरा,
मय सन्निहित हा! उस भृकुटि की तीक्ष्णता--
होता प्रबल बरबस ही मन उद्विग्नता;
मम स्वप्न का प्रतिबिम्ब है यह नेत्र-दर्पण।
चाहता सर्वस्व कर दूं आज अर्पण ।।
बृहस्पतिवार, 21 जनवरी 2010
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