गुरुवार, 21 जनवरी 2010

एक आहवान...पत्रकारों की लेखनी से

हो सीमाओं से स्वच्छन्द तेरा विस्तार नया ।
कर सृजन लेखनी एक स्वच्छ संसार नया।।
अदृश्य कंटकों के बीजों से सजी राह है,
देख जगत् का यह स्वरुप मन भरे आह है;
यह विजित मनुजता आज करे क्यों आत्मदाह है,
सुसुप्त भाव भी जागृत हों, बस एक चाह है--
सूखे दरख्त में हो जीवन-संचार नया।
कर सृजन लेखनी एक स्वच्छ संसार नया।।
अनाचार का अधम कुहासा बड़ा सघन है,
विष-वर्षा से अर्द्धदग्ध अपना उपवन है,
उद्विग्न, त्रस्त, शोकाकुल सब हर पल हर क्षण है;
व्यथा-वेदना-आच्छादित प्रकृति कण-कण है,
नवजीवन के खातिर हो सुधा-फुहार नया।
कर सृजन लेखनी एक स्वच्छ संसार नया।।
तेरी माँ, बेटी पूछो मत कैसे जीती है,
धिक्कार! वो दुर्घटनाएं, जो उसपे बीती है,
तेरे रहते बहना तेरी आंसू पीती है,
जला दे दानवता, वो जिस कारण रोती है;
करें चल नारी-गौरव का मिलकर शृंगार नया।
कर सृजन लेखनी एक स्वच्छ संसार नया।।
ऊसर-बंजर पर भी हरीतिमा लाना है,
पत्थर को भी बस आज हमें समझाना है,
धरती-सी बहरों को सब कथा सुनाना है,
असंभव लगता, पूरा कर सभी दिखाना है,
वो देख क्षितिज पर गगन-अवनि-अभिसार नया।
कर सृजन लेखनी एक स्वच्छ संसार नया।।
पाषाण-हृदय पर भी उत्पल महकाना है,
विषाक्त बिचारों को कब्रों में सुलाना है,
हर एक 'मानवबम' को एक 'मनुज' बनाना है,
पके हुए बर्तन पर रंग चढ़ाना है,
विकृत को दे नवरूप बनो कुम्हार नया।
कर सृजन लेखनी एक स्वच्छ संसार नया।।
जन-गण की अशिक्षा, निर्धनता हा! सम्मुख तनती,
बरबस ही भूखे नंगों की तस्वीर-सी बनती
और करुण-कथा कहते-कहते वो क्रन्दन करती,
तस्वीर को देना है हर्षित आकार नया।
कर सृजन लेखनी एक स्वच्छ संसार नया।।
शिक्षा, अध्ययन क्या होता है, न ये जाना,
वो पतंग के खेल, मस्त गाना गाना--
स्वच्छन्द हवाओं के रुख को न पहचाना,
दिन भर काम के बदले में मिलता खाना;
उन कुंठित नन्हें बचपन को दो प्यार नया।
कर सृजन लेखनी एक स्वच्छ संसार नया।।
भले अभी ना, पर हो तेरे बाद सही
कोई प्रमाद, अवसाद या शोक-विषाद नहीं,
दुख-दर्द से आहत कहीं कोई संवाद नहीं,
आमोद-हर्ष से चिर-सुस्मित हो याद यहीं;
भावी संतति को ऐसा उपहार नया।
कर सृजन लेखनी एक स्वच्छ संसार नया।।
भावों की सरिता अविरल, निर्मल, निश्छल हो,
उद्वेलित मन करने की उसमें शक्ति प्रबल हो,
मनोहर सुन्दर बातों से मन में हलचल हो,
मोद-मंगल का अन्तःकरण में कोलाहल हो,
प्रस्फुटित हो हृत्-स्पर्शी वो उद्गार नया ।
कर सृजन लेखनी एक स्वच्छ संसार नया।।
कालजयी इतिहास रचा कोई तुझसा ही,
कथा-संदर्भ में 'मानवता', 'जीवन-पथ-राही',
कागज बनता भू-पृष्ठ कहीं सागर जल स्याही,
जिसमें हर पथिक सदा देखे अपनी प्रतिछाँही;
अखिल वसुन्धरा हो अपना परिवार नया।
कर सृजन लेखनी एक स्वच्छ संसार नया।।
अनंत-उत्स से अनिषिद्ध बहता निर्झर है,
संदेश निरंतर देता-- यह बस जीवन-स्वर है,
आता-जाता हेमंत, बसंत, शिशिर, पतझड़ है,
जीकर भी बन गया मृतक जो गया ठहर है,
ठहरे जीवन में भी ला दे तू ज्वार नया।
कर सृजन लेखनी एक स्वच्छ संसार नया।।
नए परंपराओं का गढ़ गढ़ना बांकी है,
अनकहे गूढ़ प्रश्नों को भी कहना बांकी है,
अथक साथ रह अनिश कार्य करना बांकी है,
विजेता बनने को युद्ध हमें लड़ना बांकी है;
इस योद्धा का तू ही बन जा तलवार नया।
कर सृजन लेखनी एक स्वच्छ संसार नया।।

मैनें जमीं पर चांद देखा

इस यौवन में है स्मरण
अपना बचपन,
वो किस्सा का उद्धरण-
श्वेत दुधिया आभा प्रकीर्ण,
मनोहर सुन्दरता,
अद्वितीय उज्ज्वल प्रभा
पारलौकिक तेज-ओज,
दिव्य-सौन्दर्य समाहित
रजनी के तिमिर तल पर
चांद रहता है ।
पारिजात के पुष्प खिलते,
फिर सहज छा जाता -
चिर-बसंत-बहार,
खूश्बू की खुमार,
मोतियों की-सी कांति, जब-जब
चांद हंसता है ।
परितः बिछ जाता
एक अलौकिक वृत्त
जगसमादरित
स्वतः स्वीकार्य आकर्षण
बिछती है चांदनी
नृत्य करता मुग्ध मन से मोर
और प्रणय-अनल में तपता चकोर
जब-जब
चांद खिलता है ।
विशाल नभथाल में
तारे मंडराते इर्द-गिर्द
और साथ लेकर
'प्रसन्न चेहरा', 'मुस्कान', 'हर्ष',
'गुदगुदी',
'अचम्भा', 'हिचकियां',
'अनिमेष नेत्र'
सप्तर्षि मिलते राह में
दुनियां की नजरें घूमती
उसके कदम के साथ ही जब
चांद चलता है।
"पूनम हा !"-
वाक् मेरा उनके लिए
फिर अचानक-
वह रौशनी कुछ मंद पड़ती,
शर्म का आंचल दिखा,
धीरे-धीरे मुखरा छिपा;
मन में उसे देखने को
पल भर मैं आंखें बंद किया
फिर खोला, तो ऐसा लगा-
अपनी तारीफ सुनकर,
बादलों की ओट में वो
चांद छुपता है ।
मेरी अभिलाषा है-
मन की शांति, शुकून और चैन के लिए
हमेशा देखता रहूं
चांद का यह सुस्मित चेहरा;
पर न जाने क्यों
सबसे शरमाकर
या मुझसे रूठकर ही
यह लंबी अमावस को चला जाता है
और तब
स्वाति की आस लगाए चातक की तरह,
घन-बूंद को तरसते मोर की तरह,
जल-हीन मीन की तरह
यह मेरा उद्विग्न मन
तड़पता रहता है जब
चांद सोता है ।
अभिलाषा है उससे दोस्ती की,
पर उसे कुछ नहीं बोलता
कि वो कहीं रूठ न जाए...
बचपन में कहानी सुनकर आस जगी थी,
और इंतजार में गुजारा
जवानी तक यह लंबा सफर,
अब इसे नहीं खोना चाहता;
कुछ और मुझे हासिल हो, न हो,
पर यह क्या कम है कि
जिसे लोग आसमां में देखते हैं
इतने करीब से, अपनी नजरों से
मैंने जमीं पर चांद देखा ।

चाहता सर्वस्व कर दूं आज अर्पण...

पाकर तेरे मूक नयनों का निमंत्रण।
चाहता सर्वस्व कर दूं आज अर्पण।।
चन्द्र-मुख-जाज्वल्य पर कुछ तेज यों,
मैं स्वतः ही हो रहा निस्तेज क्यों;
प्रष्टा बनी चुपचाप मुझसे पूछती है,
असहज होकर वो कुछ पल सोंचती है--
होगी विजय किसकी ? कहीं हारूं न मैं रण।
चाहता सर्वस्व कर दूं आज अर्पण ।।
इस शर्म को न तू समझ कोई पण मेरा,
है अपेक्षित एक परिरम्भण तेरा,
मय सन्निहित हा! उस भृकुटि की तीक्ष्णता--
होता प्रबल बरबस ही मन उद्विग्नता;
मम स्वप्न का प्रतिबिम्ब है यह नेत्र-दर्पण।
चाहता सर्वस्व कर दूं आज अर्पण ।।