हृत्पत्र
शुक्रवार, 30 जनवरी 2009
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मेरे बारे में
VIJAY THAKUR
हक़ीक़त तो क्या जो ख्वाब भी मैं बुन गया। जब जो जहां अच्छा लगा वह छिन गया।। हारकर सबकुछ बना हूं मैं ‘विजय’। अब पास तन्हां वो भी अपना ही हृदय।। vkt.vijay@gmail.com
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मैनें जमीं पर चांद देखा
चाहता सर्वस्व कर दूं आज अर्पण...
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